Wednesday, February 13, 2019

नवधा भक्ति  में सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम  प्रकार है ..... आत्मनिवेदन :  अर्थात  अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पित कर  देना और  अपनी  कुछ  भी स्वतंत्र सत्ता ना  रखना............परम भक्त  विशुद्ध निष्काम दास्य भाव से परिपूर्ण  हनुमत समर्पण भाव की सटीक मूर्ति है ..जो सुख और आनंद  हनुमत को अपने प्रभु  के सानिध्य से प्राप्त है ....... उस  सुख  से तो प्रभु  श्री राम  भी वंचित है.... हनुमत अपने प्रभु श्री राम की सेवा  से  अमृत स्वरूप उस परम प्रेम का  अस्वादन करते है ......... जिसके  स्वाद से स्वयं तृप्ति भी अतृप्त है ....बल  शाली  वीर हनुमत की  समस्त  अथाह शक्तिया  उनकी अनंत ऊर्जा  तरुण पुष्प बन सदा प्रभु श्री राम के श्री चरणो में समर्पित है ,............., ऐसी अनिर्वाचनिय भक्ति आहा ......;;;;सूर्यवंशी श्री राम के  चरणो में आसीन हनुमत अनेको नेक सूर्यों का तेज़ अपने में समाए है ..... फिर भी  सदा अपनी मृदु सेवा भाव से अपने प्रभु को शीतलता दे रहे है ............. हनुमत का रोम रोम गहरे कूप है  जिनमें अथाह अनंत राम भरे हुए है ........   और प्रभु  श्री  राम का रोम रोम में हनुमत के उस दिव्यतम प्रेम से आभाए मान है .........हम सब भी इस भक्ति के इस मार्ग को हनुमत की कृपा सो सुगम कर पावे ऐसी कामना....... गुरु कृपा (दास अधम ) 

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