हमारे पास एक ही पूँजी है.... जिसके द्वारा हम उस परमात्मा उस ईश्वर उस श्याम सुंदर को अनुभव कर सकते है........वो पूँजी है प्रीति......इस प्रीति रूपी पूँजी को हमने अपने जीवन में कई स्थानो वस्तु और सम्बन्धो व्यय किया हुआ है......... पर जाहा भी हमने अपनी इस प्रीति को लगाया है उसमें कोई ना कोई कामना है.......... हमारी प्रीति जब अपने बालकों को प्रति है तो वो —- स्नेह है .......जब यही प्रीति हमें अपने हम उम्र वाले जीवों के प्रति होती है तो ये प्रीति —— आसक्ति है...... यही प्रीति जब अपने से बड़ों के प्रति है तो ये प्रीती कर्तव्य है.......... और यही प्रीति जब अपने से अधिक जानकार या ज्ञानी के प्रति हो तो ऐसी प्रीति को...... श्र्धा कहते है .......पर ये सभी प्रकार की प्रीति कामना से भरी है....... हर सम्बंध में हमें कोई ना कोई स्वार्थ है कोई ना कोई कामना है जिसके चलते हम इन सभी सम्बन्धो में प्रीति ख़र्च करते है.........जब यही प्रीति बिना किसी कामना मोह या निज स्वार्थ के हो तो ये प्रीति भक्ति बन जाती है....... हर सम्बंध भक्ति यानी विशुद्ध प्रीति का समावेश हो जाता है...... भक्त केवल अपने प्रभु का ही निज भक्त नहि रह जाता बल्कि ऐसे भक्त को प्रत्येक सम्बंध में अपने प्रभु की छवि नज़र आती है ...... उसके लिए सर्वत्र ईश्वर मयी हो जाता है ....आप सब उस निष्काम प्रेम का स्वाद चख पावे जो मोह की परिधि से परे है ऐसी कामना ......गुरु कृपा (दास अधम)
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