हमारे पास एक ही पूँजी है.... जिसके द्वारा हम उस परमात्मा उस ईश्वर उस श्याम सुंदर को अनुभव कर सकते है........वो पूँजी है प्रीति......इस प्रीति रूपी पूँजी को हमने अपने जीवन में कई स्थानो वस्तु और सम्बन्धो व्यय किया हुआ है......... पर जाहा भी हमने अपनी इस प्रीति को लगाया है उसमें कोई ना कोई कामना है.......... हमारी प्रीति जब अपने बालकों को प्रति है तो वो —- स्नेह है .......जब यही प्रीति हमें अपने हम उम्र वाले जीवों के प्रति होती है तो ये प्रीति —— आसक्ति है...... यही प्रीति जब अपने से बड़ों के प्रति है तो ये प्रीती कर्तव्य है.......... और यही प्रीति जब अपने से अधिक जानकार या ज्ञानी के प्रति हो तो ऐसी प्रीति को...... श्र्धा कहते है .......पर ये सभी प्रकार की प्रीति कामना से भरी है....... हर सम्बंध में हमें कोई ना कोई स्वार्थ है कोई ना कोई कामना है जिसके चलते हम इन सभी सम्बन्धो में प्रीति ख़र्च करते है.........जब यही प्रीति बिना किसी कामना मोह या निज स्वार्थ के हो तो ये प्रीति भक्ति बन जाती है....... हर सम्बंध भक्ति यानी विशुद्ध प्रीति का समावेश हो जाता है...... भक्त केवल अपने प्रभु का ही निज भक्त नहि रह जाता बल्कि ऐसे भक्त को प्रत्येक सम्बंध में अपने प्रभु की छवि नज़र आती है ...... उसके लिए सर्वत्र ईश्वर मयी हो जाता है ....आप सब उस निष्काम प्रेम का स्वाद चख पावे जो मोह की परिधि से परे है ऐसी कामना ......गुरु कृपा (दास अधम)
Friday, February 15, 2019
जब प्रेम का प्रवाह हृदय में होता है तो ज्ञान विवेक हो जाता है...........जैसे बालक जब जन्म लेता है तो जन्म देने वाली माँ बच्चे के प्रति सावधानी या देख रेख को लेकर कोई किताब नहि पड़ती..........बालक के प्रति हुए उस अथाह प्रेम के चलते जन्म देने वाली माँ स्वतः ही जागरूक हो जाती है बालक के प्रति सजग हो उसके लिए क्या अच्छा क्या बुरा सभी जानकारी स्वतः ही विवेक बन प्रकट हो जाती है.....मुझे लगता है प्रेम से ज्ञान उपजा है ज्ञान से प्रेम नहि.......
जब प्रेम का प्रवाह हृदय में होता है तो ज्ञान विवेक हो जाता है...........जैसे बालक जब जन्म लेता है तो जन्म देने वाली माँ बच्चे के प्रति सावधानी या देख रेख को लेकर कोई किताब नहि पड़ती..........बालक के प्रति हुए उस अथाह प्रेम के चलते जन्म देने वाली माँ स्वतः ही जागरूक हो जाती है बालक के प्रति सजग हो उसके लिए क्या अच्छा क्या बुरा सभी जानकारी स्वतः ही विवेक बन प्रकट हो जाती है.....मुझे लगता है प्रेम से ज्ञान उपजा है ज्ञान से प्रेम नहि........
Wednesday, February 13, 2019
नवधा भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम प्रकार है ..... आत्मनिवेदन : अर्थात अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पित कर देना और अपनी कुछ भी स्वतंत्र सत्ता ना रखना............परम भक्त विशुद्ध निष्काम दास्य भाव से परिपूर्ण हनुमत समर्पण भाव की सटीक मूर्ति है ..जो सुख और आनंद हनुमत को अपने प्रभु के सानिध्य से प्राप्त है ....... उस सुख से तो प्रभु श्री राम भी वंचित है.... हनुमत अपने प्रभु श्री राम की सेवा से अमृत स्वरूप उस परम प्रेम का अस्वादन करते है ......... जिसके स्वाद से स्वयं तृप्ति भी अतृप्त है ....बल शाली वीर हनुमत की समस्त अथाह शक्तिया उनकी अनंत ऊर्जा तरुण पुष्प बन सदा प्रभु श्री राम के श्री चरणो में समर्पित है ,............., ऐसी अनिर्वाचनिय भक्ति आहा ......;;;;सूर्यवंशी श्री राम के चरणो में आसीन हनुमत अनेको नेक सूर्यों का तेज़ अपने में समाए है ..... फिर भी सदा अपनी मृदु सेवा भाव से अपने प्रभु को शीतलता दे रहे है ............. हनुमत का रोम रोम गहरे कूप है जिनमें अथाह अनंत राम भरे हुए है ........ और प्रभु श्री राम का रोम रोम में हनुमत के उस दिव्यतम प्रेम से आभाए मान है .........हम सब भी इस भक्ति के इस मार्ग को हनुमत की कृपा सो सुगम कर पावे ऐसी कामना....... गुरु कृपा (दास अधम )
Tuesday, February 12, 2019
जान पहचान
आध्यात्मिक प्रेरणा या spiritual motivational इस blog
में आपकादिल से स्वागत ...... दोस्तों
मैंने देखा करियर रिश्तों के लिए पदाई लिखाई और business और नौकरी वगेरा के लिए कितने motivational programme चैनल blog और programme है ........ पर शायद ही आध्यात्मिक या sprictualy motivation के लिएकोई ऐसा कोई source है तो सोचा जो जानने के लिए हम सारा जीवन जानकारी इकट्ठी करते रहते है ....... जान के जाने। से पहले उसे जान लिया जाए ........बोहोत कुछ ऐसा है जो बे मतलब जाना ..... अब कुछ ऐसा जाना जाए जिसे जानने के बाद हम कितने अनजान है इस बात का अहसास हो जाए ....... आप सभी का स्वागत है sprictual चर्चा के इस ब्लॉग में
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